Saturday, 23 November 2013

जिसने बिकता बाज़ार में इन्सान देखा !!


कौन है  जिसने " तन्हा " को हैरान देखा !
जिसने बिकता बाज़ार में  इन्सान  देखा  !!

शर्म ;अदब ;गैरत ;मिले बा - ख़ुलूस कहीं !
हो कर मैंने कुछ उनको पशेमान  देखा  !!

गाँधी ;बुद्ध ही नहीं ईसा ; ख़ुदा  राम भी !
घर -घर सज़ा हुआ मैंने ये सामान देखा !!

बिकता फ़रेब  झूठ याँ साज़िल्दे हुनर  !
दर  दीवार पे चस्पा ये दास्तांन देखा !!

मत पूछ कैसे रु -रु  गद्दारे - वतन !
हो दुजानु अक्सरीयत को बे-ज़ुबान देखा !!

बे-खौफ़ जाते थे जिन पे संग ले अहबाब को !
हो दहशतज़दा इन्सान राह - -वीरान देखा !!

उलट जायेगा इक रोज़ जहाँ का चलन  !
उलटी रोशनाई में दर्ज़ हर्फ़े बयान देखा !!

हो जैसे संगे-तुर्बत पे रौशन शम्मे-मज़ार !
मैंने भी " तन्हा "जैसा नूर--इंसान देखा !!

                                      - " तन्हा " चारू !!

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!







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