Monday, 25 November 2013

ग़मों से भी कुछ अपना ....... !


ग़मों से भी  कुछ अपना साथ पुराना निकला !
निकला इक तेरा नाम लाख फ़साना निकला !!

थी मासूम मेरी ज़िद उस चाँद को पाने की  !
बहलाने को मुझे ही सारा ज़माना निकला  !!

मिलती हैं खुशियाँ यूँ तार - तार दामन को !
जैसे डूब सागर में टूटा पैमाना निकला  !!

ज़मीं कूँ - -यार भी होते हैं रौशन  !
जब उसके नाम को छेड़ तराना निकला !!

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुना था  !
कान्धों पे सवार "तन्हा" दीवाना निकला !!

                                         - " तन्हा " चारू !!


सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!



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