Saturday, 23 November 2013

संगम का हूँ पानी रखता अब तो पैमाने में !!





कितना वक़्त ज़ाया किया मुझे आज़माने में !
चले आते मुझे पूछते सीधे मयख़ाने  में !!

किसको कहते हैं बुरा चखना तो सबाब है !
वर्ना मयस्सर है कहाँ इतनी ज़माने  में !!

मन्दिर,मज्जिद,क़ाबा,हज़ सब करके छोड़ दिया !
संगम का हूँ पानी रखता अब तो पैमाने में  !!

पत्थऱ को सर नवाया घिसा माथा दहलीज़ पे !
मिले मुझे ख़ुदा राम "तन्हा" बुतखाने में !!

                                          - " तन्हा " चारू !!

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!


No comments:

Post a Comment