Sunday, 1 December 2013

लो हमने यह जाम भी साक़ी तेरे नाम किया !!



बेख़ुदी में ! साक़ी कैसा ये  तूने काम किया !
आब मिला के ज़ाम में ज़ाम को बदनाम किया !!

बेसुध हो के मैंने भी बज़मे -बोसा ले लिया !
देख़ो तो मैंने कितना तेरा एहतराम किया !!

दिया सबको तुमने भर - भर आब--जम -जम !
दौर मुझ तक आते-आते सागर क्यूँ थाम लिया !!

ख़ता हुई मुझसे कैसी जो इतने ख़फ़ा हो गये  !
ज़ाम उलट के मेरा फिर क्यूँ पलट सलाम किया !!

हम "तन्हा"रिन्दों की ख्वाहिश पूछी साक़ी ने  !
लो हमने यह जाम भी साक़ी तेरे नाम किया  !!

-          " तन्हा " चारू  !!

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!


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