Thursday, 5 December 2013

"तन्हा" उस भीड़ में जब ,अपना भी साया खो गया !!




जाने क्या कुछ सोच के,
कान्धों पे मेरे रो गया !
इक बादल का टुकड़ा जब,
छत को उसकी भिगो गया !!


खार जुबाँ पर उग आये थे ,
तलवों में भी आब था !
वो अश्कों का रेला जब ,
नाम उसका डुबो गया !!


काटी रातें आँखों में थी ,
ख्वाब भी देखे ख्वाबों के !
ले के इक करवट मौसम ,
जब पहलू में सो गया  !!


जश्न मनाया मैंने भी था ,
खोली बोतल ख़ुम की थी ,
"तन्हा" उस भीड़ में जब ,
अपना भी साया खो गया !!

-          " तन्हा " चारू !!
                                     08-02-1995
सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!


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