Friday, 3 January 2014

ज़िंदगी फिर आज ख़ुद को दोहराती है !




ज़िंदगी फिर आज ख़ुद को दोहराती है !
मेरी ज़बीं पर इमां का घर बनाती है !!

तेरे एहसास को खुशबू सा सहेजा था !
हवायें रोज़ जिसको बिख़ेर जाती हैं  !!

किस क़दर है तुझे प्यार मुझसे "तन्हा"!
हथेलियों की हिना याद तो दिलाती है !!

तेरे माथे की बिंदिया ओ कंगना पायल !
मेरा सुकूँ भी हया के साथ लिये जाती है !!

जिंदगी ! तेरे झूठे वादे पर ऐतबार कर !
मौत भी मुझसे मिलना टाल जाती है !!

तुम भी हो किस मिट्टी के साज़ "तन्हा"!
जिन्दगी न जिस पे कभी गुनगुनाती है !!

                                             -- " तन्हा " चारू !!
                                                    02-01-2014

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!


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